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मार्च, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Gidh ka bachcha

एक गिद्ध का बच्चा अपने बाप से बोला "पापा आज मुझे इंसान का गोश्त खाना है" गिद्ध बोला "ठीक हैं बेटा शाम को ला दूँगा.. गिद्ध उड़ा ओर एक सुअर का गोश्त ले कर आया।" गिद्ध का बच्चा बोला "पापा ये तो सुअर का गोश्त है , मुझे तो इंसान का गोश्त खाना है !" गिद्ध बोला "रूक शाम तक मिल जाऐगा.. गिद्ध फिर उडा ओर एक मरी गाय का गोश्त ले कर आया।" गिद्ध का बच्चा बोला "पापा ये तो गाय का गोश्त है, मुझे तो इंसान का गोश्त खाना है।" गिद्ध उडा ओर उसने सुअर का गोश्त एक मस्जिद के पास और गाय का गोश्त मंदिर के पास फेक दिया। थोडी देर के बाद वहाँ ढेर सारी इंसानों की लाशे बिछ गई बाप-बेटे ने जम के इंसान का गोश्त खाया। गिद्ध का बच्चा बोला "पापा ये कैसे हुआ, इतना सारा गोश्त ?" गिद्ध बोला "बेटा ये इंसान है ही ऐसा, ऊपरवाले ने तो इसे इंसान बना के पैदा किया पर धर्म के नाम पर इसे "जानवर" से भी बदतर बनाया जा सकता है.. और ये काम इन इंसानों में बैठे कई गिद्ध पहले से कर रहे हैं...

Ramazan

RAMZAN sabr ka mahina hai क्या है मजबूरी या मज़बूती """""""""""""""""""""""""""""""""""""""" सब्र का शाब्दिक अर्थ है रुक जाना सब्र कहते हैं खुशी गमी तकलीफ़ परेशानी व दर्द बर्दाश्त करने की ताकत को , सब्र कहते हैं किसी भी परेशानी में उस प्रतिक्रिया से बचने को जो अक़्ल व शरियत के खिलाफ हैं सब्र कहते हैं किसी नेकी और अच्छे काम पर जम जाने को , सब्र नाम है अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए हर तकलीफ़ बर्दाश्त करने का रमज़ान को सब्र का महीना इस लिए कहा जाता है कि इस में रोजेदार भूख प्यास और तकलीफों को सह कर ख़ुशी ख़ुशी अपने रब की इबादत में लगा रहता है सब्र मजबूरी नहीं मज़बूती है इस की मिसाल यूं समझ लें कि दो बच्चों को आप डाक्टर के पास इंजेक्शन लगवाने ले जाएं एक बच्चा खामोशी से इंजेक्शन लगवा लेता है और दूसरा रो कर चिल्ला कर इंजेक्शन लगवाता है इंजेक्शन से दोनों बच्चों को एक जैसी तकलीफ़ हुई...

Islam me purush aur mahila barabar Hein

"""""""""""""""""'""""""""""""" एक सवाल है कि इस्लाम एक महिला को मां होने की हैसियत से बड़ी इज्ज़त देता है जब कहता है कि मां के पैरों के नीचे जन्नत है एक बेटी होने की हैसियत से बड़ी कद्र करता है जब कहता है कि बच्चियों की अच्छी परवरिश करने वाला जन्नत में अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम का पड़ोसी होगा एक पत्नी व बहन होने के नाते उन्हें एक ऊंचा मुकाम देता है लेकिन एक महिला का महिला होने की हैसियत से इस्लाम में क्या स्थान है ? क्या महिला सिर्फ मां बेटी बहन या पत्नी है उसकी अपनी कोई शख्सियत नहीं है ? जवाब है कि इस्लाम एक महिला को महिला होने के नाते बराबर की हैसियत देता है वह उसी तरह इंसान हैं जैसे पुरूष हैं दोनों में कोई अंतर नहीं है कुरान सूरा अल हुजरात में है कि " ऐ लोगो हम ने तुम्हें एक पुरुष व महिला से पैदा किया , और तुम्हें कौमों व कबीलों में बांट दिया ताकि तुम्हारी पहचान व शिनाख्त हो सके , तुम में सब से फजीलत वाला वह ...

لا الہ الا اللہ محمد الرسول اللہ

तिर्मिज़ी शरीफ़ की रिवायत है अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया " कंजूस वह है जिस के सामने मेरा ज़िक्र किया जाए और वह मुझ पर दरूद न भेजे " जुमा का दिन वह भी रमज़ान मुबारक का जुमा अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम पर ज्यादा से ज्यादा दरूद भेजते रहिए "''""'''''''

Har kam apne samay par hota hai

हर काम अपने समय पर होता है """""""""'""""""'""""""""""""""""""" अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया था कि " तुम कुस्तुनतुनिया ज़रूर फतह करोगे , वह सेना कितनी अच्छी सेना होगी उसका अमीर कितना अच्छा अमीर होगा " यह साफ बशारत थी , ऐसी खुशखबरी थी कि हर एक की ख्वाहिश थी कि काश वह कुस्तुनतुनिया फतह करने वाली सेना में शामिल होता और हुआ भी यही हज़रत मोआविया के जमाने में जब कुस्तुनतुनिया पर दो बार हमला किया गया तो हर एक अपने को इस सेना में शामिल करने के लिए आतुर हो गया मेज़बान ए रसूल हज़रत अबू अय्यूब अंसारी बूढ़े हो चुके थे लेकिन वह भी खुद को रोक न सके सेना मे शामिल हुए और उनका वही कुस्तुनतुनिया में इंतकाल हो गया लेकिन 700 वर्षों तक कुस्तुनतुनिया फतह न हो सका ऐसा नहीं कि इस बीच मुसलमान कमज़ोर थे एक से एक शानदार हुकुमतें क़ायम थीं यह भी नहीं कि कुस्तुनतुनिया दूर था उसके चारों तरफ़ मुसलमानों ...

Raam ji

लबरेज है शराब-ए-हकीकत से जाम-ए-हिंद सब फलसफी हैं खित्ता-ए-मगरिब के राम-ए-हिंद ये हिंदियों की फिक्र-ए-फलक-रस का है असर रिफअत में आसमां से भी ऊंचा है बाम-ए-हिंद इस देश में हुए हैं हजारों मलक सरिश्त मशहूर जिन के दम से है दुनिया में नाम-ए-हिंद है राम के वजूद पे हिन्दुस्तां को नाज अहल-ए-नजर समझते हैं उस को इमाम-ए-हिंद एजाज इस चराग-ए-हिदायत का है यही रौशन तर-अज-सहर है जमाने में शाम-ए-हिंद तलवार का धनी था शुजाअत में फर्द था पाकीजगी में जोश-ए-मोहब्बत में फर्द था ✍️ अल्लामा इक़बाल सभी को रामनवमी की बधाई और शुभकामनाएं

Love story

Paul: hello bby *jane: hello *paul: how are u doing today? *jane: i'm fine *paul: There's something i want to tell you but... *jane: Whats that? go on... *paul: hope u won't get angry if i tell u? *jane: say it first *paul: ok... I wanna tell u that i... Love u... Will u be my girlfriend? *jane: yes, but on 1 condition? *paul: Ohk what condition? *jane: no s*x! *Paul: Hmmm... Ohk agreed.. Keep reading, i know if it was about God u could have skip... *GOD: i'm just missing My child today *SATAN: which child? *GOD: the one reading this post *SATAN: they can't miss u, there are my children *GOD: really? Ok lets see *SATAN: see what? *GOD: mine will comment AMEN and S.H.A.R.E This post to 7 different groups *SATAN: mine will just Scroll Without commeting or share to groups. Let's disappoint satan by typing AMEN and share to 7 groups God Bless you! I still don't know y u haven't follow the profile below 4 more jokes yet o,those w...

Islam me aurat aur parda

एक बहस चली है कि, मुसलमान लड़कियां दूसरे मज़हब के लड़कों के साथ भाग कर, शादी कर रही है। यहां बैठे लगभग लोग, जो मुसलमान होने का दम भरते हैं, वो उन्हें कोस कोस कर इस्लाम को बचा रहे हैं। लेकिन क्या कभी आप ने सोचा है, वो लड़कियां आख़िर क्यों दूसरे मज़हब के लड़कों के साथ सिर्फ़ शादी नहीं कर रही, बल्कि भाग कर शादी कर रही है? वजह पर आइए न, महज़ कोसने से कुछ नहीं होने वाला है, ऐसा करने से, आपके मन की भड़ास ही निकलेगी। मैंने इस मुद्दे पर बहुत लिखा है, जिसका उनवान, इस्लाम मे महिलाओं की आज़ादी है, जिसे हम मुसलमानों ने लड़कियों से दूर कर रखा है। फ़िर उन्हें जहाँ भी आज़ादी दिखाई देगी, वो उस तरफ़ कैसे नहीं जाएंगी? एक जमाना था, जब इस्लाम में औरतें मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चला करती थी, पर्दे वरदे की बात मत कीजिए। एक तरफ़ आप अपने घर की औरतों को बिना नक़ाब घर से बाहर तक निकलने नहीं देना चाहते हैं, दूसरी तरफ़ मस्जिद ए अक़्सा से महिलाओ की बिना बुर्के वाली तस्वीरें सरेआम शेयर करते हुए गर्व महसूस करते हैं। पर्दे का ताल्लुक़ नक़ाब से नहीं है, वो महज़ ज़रिया है पर्दे का। नक़ाब में इस्लाम नहीं है, बल्कि इस्लाम मे पर्दा ह...

God is one:pak daaman aurat ki izzat

बेशक जो लोग पाक दामन बेख़बर और इमानदार औरतों पर (जि़ना की) तोहमत लगाते हैं उन पर दुनिया और आखि़रत में (ख़ुदा की) लानत है और उन पर बड़ा (सख़्त) अज़ाब होगा Surah Al Noor 24(23) Quran

God is one...Develop for society

मुसन्ना बिन हारिसा ***************** क्या आप इन्हें जानते हैं ? होता यह है कि जब कोई कौम तरक्की कर रही होती है तो बड़े लोगों के साथ कुछ गुमनाम लोग वह बड़ा कार्य कर जाते हैं कि दुनिया देखते रह जाती है मुसन्ना बिन हारिसा भी एक गुमनाम शख्स थे इराक के अल शैबानी कबीले से इन का संबंध था फतह मक्का के बाद अपने कबीले के साथ मदीना आए और अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम से मुलाकात की कुछ इतिहासकारों ने कहा है कि इन्होंने वहीं इसलाम कबूल कर लिया और सहाबी बन गए वहीं अधिक तर इतिहासकारों का कहना है कि नहीं वह वापस लौट गए थे बाद में सोच समझ कर इसलाम कबूल किया इस्लाम कबूल कर मदीना का सफर किया जब पहुंचे तो अल्लाह के रसूल का इंतकाल हो चुका था और मदीना में हज़रत अबु बकर की ख़िलाफत थी इस तरह वह सहाबी नहीं ताबई हैं उन दिनों ईराक पर ईरान के सासानी परिवार की हुकूमत थी जो उस समय विश्व के सुपर पावर थे अरब से इसलाम को मिटा देना चाहते थे कई बार कोशिश भी की थी वहां का बादशाह अल्लाह के रसूल का खत भी फाड़ चुका था हज़रत अबु बकर चाहते थे कि उनके ख़तरे को रोकने के लिए कुछ आक्रमण नीति अपनाई जाए और एक सेना ...

Hazrat moosa a.s.aur unki qaum

" मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि अल्लाह से मदद मांगो और सब्र करो , बेशक ज़मीन अल्लाह की है अपने बंदों में से जिसे चाहता है इस का वारिस बनाता है और ( अच्छा ) अंजाम तक़वा वालों के लिए है " ( कुरान ) पूंजीपतियों ने मूंह से नहीं कहा पर इस ज़मीन को अकेला अपना मान कर हर जायज़ व नाजायज़ तरीके से इस का दोहन किया कम्युनिस्टों ने जमीन को मजदूरों की माना और इस का मालिकाना हक सरकार को दे दिया सरकार ने मालिकाना हक़ पा कर हर तरह से ज़ुल्म किया लोगों को उजाड़ दिया रातों रात उन्हें एक जगह से उठा कर दूसरी जगह ले जा कर पटक दिया सोवियत संघ के समय जोज़फ स्टालिन वगैरह ने जो किया उसे सुन कर रूह कांप जाती है नबियों ने कहा कि जमीन अल्लाह की है और अल्लाह जिसे चाहता है इस का मालिक बनाता है वह ज़ुल्म नहीं करता पर ज़ुल्म को बर्दाश्त भी नहीं करता जालिमों को ढील ज़रूर देता है पर जब ज़ुल्म ज्यादा होता है तो जमीन को पलट भी देता है कभी ज़लज़ला कभी सैलाब कभी सूखा कभी बेवकत की बारिश यह सब इंसानों के अपने कामों के फल हैं इस ज़मीन पलटने और दूसरी मुसीबतों का शिकार वह लोग भी होते हैं जो अच्छे हैं तक़वा वाले ह...

Musalman aur andhbhakti

अंधभक्ति बहुत ही बुरी चीज़ है एक अंधभक्त खुद तो ग़लत होता ही है साथ में जिस की अंधभक्ति करता है उसे भी ग़लत साबित कर देता है अंधभक्त सिर्फ दूसरों में हों ऐसा नहीं है मुस्लमानों में भी इनकी कमी नहीं है एक बुजुर्ग के बारे में उनके अंधभक्त कहते हैं कि वह एक रात में एक हजार रकात नफिल नमाज़ पढ़ते थे दस बारह घण्टे की रात में एक हज़ार रकअत नमाज़ पढ़ना मुमकिन ही नहीं है और मान लीजिए कोई पढ़ भी लेता है तो यह तारीफ की बात कैसे हो गई? सवाल यह है कि नमाज़ या दूसरी इबादतों में क्वांटिटी का महत्व है या क्वालिटी का ? फ़र्ज़ नमाज़ की तादाद फिक्स है लेकिन नफिल नमाज़ व्यक्ति के उपर है जितनी तौफीक मिले अब अगर कोई ज्यादा रकअत का लक्ष्य बना लें तो ज़रूर उसे क्वालिटी से कंप्रोमाइज करना पड़ेगा , किसी चीज़ की क्वालिटी से कंप्रोमाइज करना तारीफ की बात कैसे हुई यह तो एक ऐब है अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम एक रात में 8 रकअत तहज्जुद और तीन रकअत वित्र नमाज़ पढ़ते थे यह आठ रकअत ऐसी होती थी कि खड़े खड़े आप के कदमों में सूजन आ जाती थी सवाल यह है कि अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम की आठ रकअत बेहत...

Islam me gents & ladies same

इस्लाम में पुरूष व महिला बराबर हैं """""""""""""""""""""""""""""""'""""""""""""" एक सवाल है कि इस्लाम एक महिला को मां होने की हैसियत से बड़ी इज्ज़त देता है जब कहता है कि मां के पैरों के नीचे जन्नत है एक बेटी होने की हैसियत से बड़ी कद्र करता है जब कहता है कि बच्चियों की अच्छी परवरिश करने वाला जन्नत में अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम का पड़ोसी होगा एक पत्नी व बहन होने के नाते उन्हें एक ऊंचा मुकाम देता है लेकिन एक महिला का महिला होने की हैसियत से इस्लाम में क्या स्थान है ? क्या महिला सिर्फ मां बेटी बहन या पत्नी है उसकी अपनी कोई शख्सियत नहीं है ? जवाब है कि इस्लाम एक महिला को महिला होने के नाते बराबर की हैसियत देता है वह उसी तरह इंसान हैं जैसे पुरूष हैं दोनों में कोई अंतर नहीं है कुरान सूरा अल हुजरात में है कि " ऐ लोगो हम ने तुम्हें एक पुरुष व महिला स...

Ummeed e zarurat

"इंसानों की ज़रूरत का कोई ऐसा दरवाज़ा नहीं जिसे शरीयत ने खोल न रखा हो।" ~ईमाम इब्न तैमिया रह०

Veshya

भारत में डेढ करोड़ वैश्याऐं हैं यह संख्या कई देशों की की कुल जनसंख्या से भी अधिक है। इस देश में गंगा (नदी) माता है, गाय (जानवर) माता है, धरती माता है। मगर औरत (इंसान) वैश्या है और वैश्या भी एक या दो हजार नहीं बल्कि डेढ करोड़ हैं। पार्कों में जाकर डंडे लाठी से देश के प्रेमी युगल को ‘संस्कृती’ सिखाने वालों को एक बार कोठे पर भी जाना चाहिये। ताकि अपने हाथो से तैयार की गई वैश्या संस्कृति का बदसूरत चेहरा देख सकें। भारत माता है अथवा पिता है इस बहस के बीच यह सवाल जोर से उठ जाना चाहिये कि भारत माता हो या पिता मगर उसकी डेढ करोड़ संतान वैश्या क्यों है ...???

Ramazan

रमज़ान सब्र का महीना है सब्र क्या है मजबूरी या मज़बूती """""""""""""""""""""""""""""""""""""""" सब्र का शाब्दिक अर्थ है रुक जाना सब्र कहते हैं खुशी गमी तकलीफ़ परेशानी व दर्द बर्दाश्त करने की ताकत को , सब्र कहते हैं किसी भी परेशानी में उस प्रतिक्रिया से बचने को जो अक़्ल व शरियत के खिलाफ हैं सब्र कहते हैं किसी नेकी और अच्छे काम पर जम जाने को , सब्र नाम है अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए हर तकलीफ़ बर्दाश्त करने का रमज़ान को सब्र का महीना इस लिए कहा जाता है कि इस में रोजेदार भूख प्यास और तकलीफों को सह कर ख़ुशी ख़ुशी अपने रब की इबादत में लगा रहता है सब्र मजबूरी नहीं मज़बूती है इस की मिसाल यूं समझ लें कि दो बच्चों को आप डाक्टर के पास इंजेक्शन लगवाने ले जाएं एक बच्चा खामोशी से इंजेक्शन लगवा लेता है और दूसरा रो कर चिल्ला कर इंजेक्शन लगवाता है इंजेक्शन से दोनों बच्चों को एक जैसी तकलीफ़...

"zoor" kiya he?

बुखारी शरीफ़ की रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया " जो ज़ूर को बोलना और उस पर अमल करना न छोड़े तो अल्लाह को कोई ज़रूरत नहीं है कि वह अपना खाना पीना छोड़ बैठे " ज़ूर क्या है --: आम तौर पर लोग ज़ूर का तर्जुमा झूठ कर देते हैं पर यह नाकाफी है ज़ूर का शाब्दिक अर्थ Fake फेक है इस में झूठ , झूठी गवाही , जालसाजी, धोखाधड़ी , खाने पीने के सामान में मिलावट , नक़ली नोट बनाना उसे चलाना और नक़ली दस्तावेज बनाना आदि सब आ जाता है इन कामों के करके रोज़ा रखने का कोई फायदा नहीं है Khursheeid Ahmad

Elaan e nubuwat

नबी करीम सललाहो अलैहे वसल्लम नबुव्वत के ऐलान के बाद 23 साल दुनिया में रहे इन में 13 साल मक्का में और 10 साल मदीना में इन 23 सालों में कुरआन नाजिल हुआ जिस में 114 सूरतें हैं इन 114 में 29 सूरतें मदीना में नाज़िल हुईं और बाकी 85 सूरतें मक्का में नाज़िल हुईं कुरान हमारी हिदायत के लिए आया है और नबी करीम सललाहो अलैहे वसल्लम हमारे लिए रोल मॉडल हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या रसूलुल्लाह की पूरी जिंदगी रोल मॉडल है या सिर्फ मदीना की जिंदगी क्या पूरा कुरान हमारी हिदायत के लिए है या मदीना वाली 29 सूरतें और बाकी मक्का वाली 85 सूरतें सिर्फ पढ़ने समझने और तिलावत के लिए है उन पर अमल करना नहीं है अल्लाह ने अपने नबी को 13 साल मक्का में क्यों रखा ? तुरंत या तीन चार साल बाद हिजरत का हुक्म क्यों नहीं दिया ? इन सवालों को पढ़ कर कोई भी कहेगा कि यह कैसे बेवकूफी वाले सवाल हैं लेकिन अफसोस यह सवाल हमारी जिंदगी हमारे अमल और हमारी बातों से उभर कर सामने आते हैं हम में से बहुत से लोग ऐसे हैं जिन का बस चलता तो वह अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम को गारे हिरा से सीधे गज़वा बदर में पहुंचा देते मेरे भ...

Zindagi aur maut

हमेशा जिन्दा रहना या मौत पर काबू पाना यह इंसान की सबसे पुरानी ख्वाहिश है इसी ख्वाहिश पर अमल करने के चक्कर में आदम को जन्नत से निकाला गया फिरऔनों ने बड़ी मेहनत की मौत पर काबू न पा सके पर इतनी सफलता मिली की लाशों को हजारों साल सुरक्षित रखने में कामयाब हो गए कुरान के मुताबिक यमन के क्षेत्र अहकाफ के शहर इरम में क़ौमे आद ने ऐसे कारखाने बनाए थे जहां हमेशा जिन्दा रहने वाले समान तैयार करने की कोशिश हो रही थी यमन की आर्थिक व राजनितिक स्थिति खराब होने के कारण अहकाफ क्षेत्र में खुदाई नहीं हो सकी वरना वहां से बहुत कुछ मिलता आज के जमाने में मेडिकल साइंस की तरक्की ने इंसान की औसत आयु बढ़ा दी है मौत पर काबू न पाया जा सका पर कुछ ज्यादा दिनों तक जीने में इंसान सफल हुआ है उस का खमियाजा भी भी भुगत रहा है कई देशों की आबादी मे सिर्फ बूढ़े दिखते हैं हमें हमारे नबी सल्ललाहो अलैहे वसल्लम ने बहुत ज्यादा बुढ़ापे से अल्लाह की पनाह मांगने की दुआ सिखाई है दूसरों पर आश्रित होने वाली उम्र तक न पहुंचे यही बेहतर है اللهم أعوذ بك أن ارد إلى أرذل العمر कभी बहुत ज्यादा लंबी उम्र की दुआ भी बद्दुआ बन जात...

Desh aur library

हमारे देश की राष्ट्रीय लाइब्रेरी कोलकाता में है जिस में 20 लाख से अधिक किताबें हैं देश की यह सबसे बड़ी लाइब्रेरी है आज जब हर तरह की सहूलियत है , कागज़ है छापाखाना हैं किताबों को सुरक्षित रखने के लिए केमिकल हैं उस के बावजूद 20 लाख से कुछ अधिक किताबें हैं आज के हजार साल पहले जब न कागज़ का अविष्कार हुआ था न छापा खाना का , लिखने की सहूलियत नहीं थी स्याही नहीं थी उस समय बीबीसी हिंदी सर्विस के अनुसार नालंदा विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में 90 लाख किताबें थी कैसे संभव है ? Ikram Ishrat

Aadam aur iblees

एक नाफरमानी इब्लीस ने की और एक नाफरमानी आदम ने भी की दोनों को सज़ा मिली एक करीबी फरिश्तों के बीच से निकाला गया दूसरे जन्नत से लेकिन फ़र्क यह था कि एक सज़ा के बाद अल्लाह की रहमत से मायूस हो गया हुज्जत करने लगा और अपने को ऊंचा साबित करने की मोहलत मांगने लगा उस ने जो मांगा वह उसे मिल भी गया दूसरे अल्लाह की रहमत से मायूस नहीं हुए उन्होंने ज़िद करने और अकड़ दिखाने के बजाय अपनी ग़लती तसलीम कर ली और उन्होंने भी एक चीज़ मांगी और वह थी अल्लाह की रहमत उन्हें भी वह चीज़ मिल गई अब हमें फैसला करना है हम किधर हैं अल्लाह की रहमत से मायूस हो कर नाशुक्री करने वालों की टीम में या अल्लाह की रहमत की उम्मीद लगाए हुए शुक्रगुजार लोगों की टीम में Khursheeid ahmad

Islam ki khoobi

अगर कोई मुझ से पूछे कि इस्लाम की सबसे बड़ी खूबी क्या है तो कहूंगा कि इस के अकीदे की सादगी और हर काम को इबादत या सवाब से जोड़ना जो काम हमारी जरूरत हैं जिन के बगैर हम जिंदा नहीं रह सकते उन कामों को भी करने में अजर व सवाब है हम खाना खाते हैं , हम पानी पीते हैं , सोते हैं , बीमार पड़ते हैं , शिक्षा हासिल करते हैं , कमाते हैं , खर्च करते हैं , शादी करते हैं, सेक्स करते हैं, पति पत्नी एक साथ बैठकर एक दूसरे को खाना खिलाते हैं , प्यार व मोहब्बत का इजहार करते हैं , बच्चे पैदा करते हैं , मां बाप भाई बहन रिश्तेदार व पड़ोसी का ख्याल रखते हैं , किसी से सलाम करते हैं , सलाम का जवाब देते हैं , बीमार को देखने जाते हैं , मरने पर श्रद्धांजलि देते हैं बड़ों का आदर करते हैं छोटों से मोहब्बत करते हैं झगड़े छुड़ाते हैं जैसे हर काम में सवाब व अजर है यह सही है कि कुछ चीजें जैसे नमाज़ रोज़ा हज जकात वगैरह फ़र्ज़ हैं जिन्हें अदा करना जरूरी है लेकिन नमाज़ के बारे में भी सूरा अल जुमा मे कहा गया है कि जब नमाज़ खत्म हो जाए तो जमीन पर फ़ैल जाओ और रोज़ी रोटी तलाश करो यानी मस्जिद में बैठे न रहो हज़रत उमर एक शख्...

Tash juye

सड़क किनारे, पार्क में, ख़ुद के मकान में, फार्महाउस या किसी होटल में आप ताश के पत्तो से जुआ खेलिए.. पुलिस पकड़ लेगी। यदि आप निहायत आम आदमी हैं तो पुलिस डंडे फटकारते हुए थाने ले जाएगी और मुकदमा दर्ज करेगी। इसके बाद यदि कोई लय मिलता पत्रकार पुलिस के हाथ लग गया तो अगले दिन अख़बार में फोटो भी छप जाएगी। सारा शहर जान जाएगा कि आप कितने हल्के, गिरे हुए और नीच इंसान हैं। लेकिन अब ह्रदय सम्राटों से खचाखच भरी हुई सरकार ने जुआ को वैलिड कर दिया, वो भी मोबाइल के जरिए जिसके प्रचारक ऋतिक रोशन, सलमान खान, रितेश देशमुख, अन्नू कपूर, मंदिरा बेदी जैसे लोग हैं। जोधपुर में इसी ऑनलाइन जुएं की लत के कारण 7 साल के बच्चे की निर्मम हत्या हो चुकी है। बहरहाल किसी चीज़ का विरोध करने का अब कोई फायदा भी नहीं है, क्योंकि कहीं ना कहीं मुझे महसूस होता है कि इस मुल्क की जनता इसी लायक है। ये इसी गत को पाना चाहते थे जो मिल गई। इन्हें अपना ही पैसा लेने के लिए लाइन में खड़ा करो और डंडे बजाओ छिंदवाड़े पर, इनपर तालाबंदी ठोको रोजी रोजगार छीन लो भीख मांगने के लिए भी बाहर निकल जाए घर से मार मारकर लाठी तोड़ डालो, इनको ऑक्सिजन मत दो, दवा ...

Abbas pathan

नहीं नहीं.. पूरा ही पशु होता है पुरुष तो.. वो भी वहशी, जंगली, दरिंदा.. इनके आधार कार्ड, वोटर कार्ड, पासपोर्ट, लाइसेंस सब कैंसिल कर दो.. पशुओं के कब आधार कार्ड होते हैं भई मोदी जी?? सारे पुरुषों को जंगल में ले जाकर छोड़ दो। ना ना... जंगल में नहीं.. जंगल में भी ये जानवरो को चैन से नहीं रहने देंगे, इन्हें ज्वालामुखी के अंदर डालकर ऊपर से ढक्कन बन्द कर दो। धरती पर सिर्फ स्त्रियों को ही रहने दो, ये खीं-खीं खां-खां करेंगी, इठलाएगी इतराऐगी, इतना आहिस्ता चलेगी कि सड़क पर भी खरोंच नहीं आएगी। मानव विकास अपने चरम पर पहुँच जाएगा। इन्ही को दे दो सारी दुनिया... सुबह सुबह दिमाग़ का दही कर दिया मुंशी प्रेमचंद ने.. Ikram Ishrat

Tahzeeb aur parda

जिस तरह आदमी का, औरत का पर्दा है। वैसे ही धर्म का भी पर्दा लाज़मी है। ये जो आप रात 3 बजे से लाउडस्पीकर पर "उठ जाओ सेहरी का वक़्त हो गया है" चिल्लाना शुरू करते हैं ना ये धर्म का अंग प्रदर्शन है। हमें किस चीज़ का प्रदर्शन करना है और किसका नहीं करना कम से कम इतना शऊर हम में होना चाहिए। एक भाई रोज़ सुबह 4 बजे मस्जिद का लाउड स्पीकर स्टार्ट करके नात पढ़ना शुरू कर देगा, ये क्या बेहूदापना है भई?? नात जैसे मुकद्दस कलाम को इस अभद्रता के साथ पेश करते हुए आपको शर्म नहीं आती?? घर घर में मोबाइल है, अलार्म है.. जो लोग फुटपाथ पर सोते हैं उनके हाथ में भी ये 5 इंच का खिलौना है जिसमें अलार्म बहुत तेज़ बजता है। फिर ज़रूरत कहाँ है लाउड स्पीकर से रोज़ 10 बार रिमाइंडर देने की?? सारी रात मुहल्ले में बच्चे गुल्ली डंडा खेलते हैं, बड़े जगते रहते हैं उसके बाद ये लाउड स्पीकर वाले भाई साहब किसे जगाते हैं?? समय के साथ अपडेट होना सीख जाइए, अपडेट नहीं होंगे तो जंक फाइल्स आपके सिस्टम को धीमा और बीमार करती जाएंगी। फिर आप कहेंगे, घरों में दीन नहीं है इसलिए सब ख़राबा हो रहा है। दीन क्या लाउड स्पीकर से घुसेड़ेंगे घरों में??...

Sabr aur Ramazan

रमज़ान सब्र का महीना है सब्र क्या है मजबूरी या मज़बूती """""""""""""""""""""""""""""""""""""""" सब्र का शाब्दिक अर्थ है रुक जाना सब्र कहते हैं खुशी गमी तकलीफ़ परेशानी व दर्द बर्दाश्त करने की ताकत को , सब्र कहते हैं किसी भी परेशानी में उस प्रतिक्रिया से बचने को जो अक़्ल व शरियत के खिलाफ हैं सब्र कहते हैं किसी नेकी और अच्छे काम पर जम जाने को , सब्र नाम है अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए हर तकलीफ़ बर्दाश्त करने का रमज़ान को सब्र का महीना इस लिए कहा जाता है कि इस में रोजेदार भूख प्यास और तकलीफों को सह कर ख़ुशी ख़ुशी अपने रब की इबादत में लगा रहता है सब्र मजबूरी नहीं मज़बूती है इस की मिसाल यूं समझ लें कि दो बच्चों को आप डाक्टर के पास इंजेक्शन लगवाने ले जाएं एक बच्चा खामोशी से इंजेक्शन लगवा लेता है और दूसरा रो कर चिल्ला कर इंजेक्शन लगवाता है इंजेक्शन से दोनों बच्चों को एक जैसी तकलीफ़...

Farman e nabi s.a.s

अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम ने रमज़ान की पहली रात के बारे में बात करते हुए फ़रमाया " इस रात एक मुनादी करने वाला मुनादी करता है और कहता है ऐ भलाई के इच्छुक आगे आओ , और ऐ बुराई के चाहने वाले रुक जाओ " ( तिरमिजी शरीफ़ ) रोज़ा नमाज़ तरावीह तिलावत भूखों को खाना खिलाना , गरीबों की मदद करना , यतीमों के सर पर हाथ रख देने जैसी तमाम नेकियों के इच्छुक लोगों के आगे बढ़ने का समय आ गया है शिर्क , बदअमली , ज़ुल्म , गीबत , लोगों के हक़ मारने और उन्हें सताने वालों के लिए अपनी हरकतों से बाज आने की घड़ी आ पहुंची है ikram Ishrat

Sehri aur iftari

सेहरी और अफ्तारी सिर्फ खाना नहीं बल्कि इबादत हैं इस लिए सेहरी और अफ्तारी ज़रूर करनी चाहिए जो भी मयस्सर हो जो भी अल्लाह ने दे रखा हो हज़रत उस्मान को बागियों ने घेर लिया उन तक खाने पीने की चीजें न पहुंचने दी घर में कुछ नहीं होता कि अफ्तार कर लें तो अफ्तारी की नीयत कर लेते थे जिस से अफ्तारी करने का सवाब मिल जाए सेहरी में देरी और अफ्तार में जल्दी सुन्नत है ikram Ishrat

Nafli ebadat aur Ramazan

रमज़ान इबादतों का महीना है जितनी तौफीक मिले करते रहना चाहिए फ़र्ज़ तो ज़रूरी हैं नफिल इबादतों में भी जहां तक मुमकिन हो ज्यादा से ज्यादा अदा करने की कोशिश करनी चाहिए हम मुसलमान हर चीज़ में बहस बहुत करते हैं लेकिन याद रखिए बहस के लिए बहुत समय पड़ा है रमज़ान बहस के बजाय काम का वक्त है तरावीह आठ पढ़ें या बीस मस्जिद में पढ़ कर घर आइए फिर घर में रात के किसी पहर जाग कर अकेले में दो रकअत चार रकआत जितनी हो सके अदा किजिए , अपने को अल्लाह के सुपुर्द कर दिजिए, सजदे में जाइए तो ऐसा लगे कि आज सब कुछ मांग कर ही उठना है पड़े रहिए सजदे में रुकू में यह सोचकर कि हम अल्लाह के दरबार में हैं अगर कारोबार नौकरी की वजह से ऐसा रोज़ न हो पाए तो किसी किसी रात को ऐसा जरूर किजिए अल्लाह हमें तौफीक़ दे कि हम उसकी इबादत सही तरीके से अदा कर सकें Ikram Ishrat

Roza aur Qur'an

क़ुरआन सूरा अल बक़रा में रोज़ा फ़र्ज़ होने की बात कही गई है इस सूरा की आयत नंबर 183-184- 185-187 में रोज़ा रमज़ान और उस के अहकाम पर बात हुई है लेकिन बीच में आयत नंबर 186 का टापिक दूसरा है इस आयत में है कि "( हे नबी )जब आप से मेरे बंदे मेरे बारे में सवाल करें तो मैं करीब हूं मैं दुआ करने वाले की दुआ सुनता हूं जब वह मुझ से दुआ करता है , तो उसे चाहिए कि मेरा हुक्म माने और मुझ पर ईमान लाए ताकि वह हिदायत पाए " रमज़ान और रोज़े के हुक्म के बीच यह आयत बेमक़सद नहीं है बल्कि इस से यह समझ में आता है कि रमज़ान में और रोज़े की हालत में दुआएं ज़्यादा कबूल होती हैं यह ऐसा मौका है जिस का हमें फायदा उठाना चाहिए दुआएं दो तरह की होती है एक वह जो कुरान व हदीस से साबित है और उनके अल्फ़ाज़ में हैं दूसरी वह दुआएं जो हमारे अपने शब्दों में होती हैं जो दुआए मसनूना हैं उनका अपना महत्व है उन्हें याद करना चाहिए लेकिन कभी कभी यह तकल्लुफ छोड़ कर अपने शब्दों में अपने अंदाज में टूटे फ़ूटे लहजे में भी दुआ ज़रूर करनी चाहिए अल्लाह हमारे हर भेद को जानता है उस के सामने तकल्लुफ कैसा अपने शब्दों में ही आद...

Aadam aur hawwa

जब आदम अलैहिस्सलाम और माई हव्वा को जन्नत से निकाल कर दुनिया में भेज दिया गया तो दोनों ने अल्लाह से दुआ की यह कह सकते हैं कि इस धरती पर इंसान की यह पहली दुआ थी " रब्बना ज़लमना अन्फुसना व इन लम तग़फिर लना व तरहमना लनकून्ना मिनल खासिरीन " " हे हमारे रब हम ने अपने आप पर ज़ुल्म किया है अगर तू हमें माफ़ नहीं करेगा और हम पर रहम नहीं करेगा तो हम जरूर घाटा उठाने वालों में से हो जाएंगे " दुआ बहुत महत्वपूर्ण है रमज़ान में इसे दोहराते रहना चाहिए Ikram Ishrat

Nabi samaaj aur raham

नबी सुधार करने के लिए आते हैं मिटाने और बर्बाद करने नहीं दुनिया में जितने नबी आएं उन का मकसद था लोगों को बुराई से अच्छाई की तरफ़ लाना , उनकी कमियों को दुरुस्त करना उनकी खराबियों की इस्लाह करना अगर कभी उन्हें ताक़त के इस्तेमाल की जरूरत भी होती है तो उतना ही इस्तेमाल करते हैं जिस से उनका मिशन सुचारू रूप से चल सके इसकी मिसाल हमारे नबी सललाहो अलैहे वसल्लम की जिंदगी से मिलती है उन्होंने सत्रह जंगो में भाग लिया लेकिन इन युद्धों में भी यही प्रयास होता कि न सिर्फ अपना बल्कि दुश्मन का भी कम से कम जानी नुकसान हो फतेह मक्का की जंग में एक कमांडर जिनके पास सेना का झंडा होता था जोश में आ गए और कहा कि आज बदले का दिन है ( اليوم يوم الملحمة ) आप ने सिर्फ इतनी बात पर उन्हें जिम्मेदारी से हटा दिया और कहा कि नहीं आज रहमत का दिन है ( اليوم يوم المرحمة ) मुंह से झाग उड़ाते हुए तकरीर करने वालों की बातों में न आइए खुद से सोचिए किसी को मिटाने के लिए अल्लाह अजाब के फरिश्तों को भेजता है अगर उन्हें न भेज कर नबी को भेजा है तो मकसद भी कुछ दूसरा है और वह मकसद सुधार का है न कि बर्बाद करने व मिटाने का Ikra...

Islam aur Qur'an

हम मुसलमान हैं कुरान हमारे पास अल्लाह की अमानत है 1-इसे देख कर पढ़ना यानी तिलावत भी करनी है 2-इसे याद हिफ्ज़ भी करना है 3-इस का तर्जुमा व मतलब भी जानना है 4-इस पर अमल भी करना है यह नहीं कहा जा सकता है कि इन चारों चीजों में से यह करो या यह न करो कुछ लोग तर्जुमा पढ़ने से मना करते हैं और कुछ तिलावत से रोकते हैं बल्कि कुछ लोग तिलावत का मज़ाक तक उड़ाते हैं कि कुरान इस लिए नहीं नाज़िल हुआ था कि उसे बगैर समझे पढ़ा जाए ऐसा नहीं है बल्कि कुरान से हमारा हर ताल्लुक अहम है हर संबंध महत्वपूर्ण है हर निसबत जरूरी है तिलावत छोड़ने का नतीजा यह है कि आज कुछ बड़े बड़े इस्लामी स्कालर जिन्हें हजारों लाखों लोग सोशल मीडिया पर फालो करते हैं वह कुरान ग़लत पढ़ते हैं तजवीद तो बड़ी बात है जबर ज़ेर में गलती करते हैं अगर न यकीन हो तो किसी हाफ़िज़ से पूछ सकते हैं वह बताएंगे कि ऐसे कई आलिम व स्कालर हैं जो कुरान ग़लत पढ़ते हैं कुछ इस्लामी स्कालर को अपनी कमज़ोरी पता है उन्होंने इस का हल निकाला कि अपनी तकरीरों में कुरान पढ़ते ही नहीं सीधे तर्जुमा कर देते हैं लेकिन कुछ इतने ढीठ किस्म के होते हैं जिन्हें कोई...

Hazrat younus.a.s.m

यूनुस अलैहिस्सलाम जब व्हेल मछली के पेट में पहुंच गए और बचने की उम्मीद न रही उस समय उन्होंने अल्लाह से दुआ की " ला इलाहा इल्ला अंता , सुब्हानका , इन्नी कुंतू मिनज़्ज़ालिमीन " तेरे इलावा कोई माबूद नहीं है , तू पाक है , मैं ही ज़ालिमों में से था इस दुआ के बाद उन्हें निजात मिली , मुसीबत से निजात की यह एक बेहतरीन दुआ है Ikram Ishrat

Qur'an meaning

कुरआन का शाब्दिक अर्थ होता है पढ़ना सूरा अल क़्यामा में है فإذا قرأناه فاتبع قرآنه जब हम पढ़ चुके तो इस पढ़ने की इत्तेबा करो यानी उसे पीछे पीछे पढ़ो कुरआन उस किताब को कहते हैं जो बार बार और ज्यादा पढ़ी जाए आज बहुत से लोग कहते हैं कि कुरआन किताबे हिदायत है जैसा कि सूरा बकरा में है इसलिए सिर्फ इस का मतलब समझना है पढ़ना नहीं है तिलावत नहीं करनी है किरात करना एक फिजूल काम है अगर आप किसी बात का मतलब नहीं समझते हैं तो उसके पढ़ने का मतलब आप बगैर समझे बड़बड़ा रहे हैं इस में कोई शक नहीं है कि कुरआन किताबे हिदायत है इस का समझना और समझ कर अमल करना ज़रूरी है पर कुरआन कुरआन है इस की तिलावत भी जरूरी है इस की किरअत भी जरूरी है इसे याद करना भी जरूरी है अगर आप को लगता है कि जरूरी नहीं है तो पहले इस किताब का नाम बदल दो जब तक यह किताब कुरआन रहेगी हम पढ़ते और तिलावत करते रहेंगे कुरआन एक मुकम्मल किताब है इस में साढ़े छह हजार से ज्यादा आयतें हैं किसी एक आयत के आधार पर सब आयते रद्द नहीं हो जाती हैं आप सब पढ़िए तो आप को समझ में आएगा अपनी जहालत या कम पढ़ा होना किसी पर न थोपें अल्लाह के रसूल ...

Hazrat Umar.r.anh

हज़रत उमर रज़िल्लाह अनहो ने कुछ लोगों को जुमा की नमाज के बाद मस्जिद में बैठा हुआ देखा तो पूछा तुम लोग कौन हो ? उन्होंने कहा कि हम अल्लाह पर तवक्कुल करने वाले लोग हैं आप ने फ़रमाया कि नहीं तुम तवक्कुल का बहाना करने वालों में से हो तुम लोगों में से कोई भी काम धंधा छोड़ कर बैठ न जाए और फिर यह दुआ करे कि ऐ अल्लाह मुझे रिज़्क़ अता कर , जबकि उसे अच्छी तरह मालूम है कि आसमान से सोने चांदी की बारिश नहीं होती , अल्लाह तुम्हें एक दूसरे के सहारे से रोज़ी देता है क्या तुम ने वह आयत नहीं सुनी " जब नमाज़ अदा कर चुको तो जमीन में फ़ैल जाओ और अल्लाह के फ़ज़ल ( रिज़्क़ ) तलाश करो " और इस के बाद हज़रत उमर ने उन्हें मस्जिद से निकाल दिया Ikram Ishrat

Islam aur business

इसलाम में सबसे महत्वपूर्ण स्थान नबियों का है उनके बाद सिद्दीकीन फिर शहीदों का इन लोगों के साथ क़यामत में एक और ग्रुप होगा वह होगा इमानदार बिजनेसमैन का ग्रुप ईमानदार व्यापारी अंबिया सिद्दीकीन और शोहदा के साथ होगा यह बिजनेस में इमानदारी का बहुत बड़ा फायदा है Ikram Ishrat

ALLAH is one