Islam me purush aur mahila barabar Hein

"""""""""""""""""'""""""""""""" एक सवाल है कि इस्लाम एक महिला को मां होने की हैसियत से बड़ी इज्ज़त देता है जब कहता है कि मां के पैरों के नीचे जन्नत है एक बेटी होने की हैसियत से बड़ी कद्र करता है जब कहता है कि बच्चियों की अच्छी परवरिश करने वाला जन्नत में अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम का पड़ोसी होगा एक पत्नी व बहन होने के नाते उन्हें एक ऊंचा मुकाम देता है लेकिन एक महिला का महिला होने की हैसियत से इस्लाम में क्या स्थान है ? क्या महिला सिर्फ मां बेटी बहन या पत्नी है उसकी अपनी कोई शख्सियत नहीं है ? जवाब है कि इस्लाम एक महिला को महिला होने के नाते बराबर की हैसियत देता है वह उसी तरह इंसान हैं जैसे पुरूष हैं दोनों में कोई अंतर नहीं है कुरान सूरा अल हुजरात में है कि " ऐ लोगो हम ने तुम्हें एक पुरुष व महिला से पैदा किया , और तुम्हें कौमों व कबीलों में बांट दिया ताकि तुम्हारी पहचान व शिनाख्त हो सके , तुम में सब से फजीलत वाला वह है जो सबसे अधिक तकवा ( अल्लाह से डरने) वाला है " इस आयत में वह तमाम लोग शामिल हैं जो एक मर्द आदम व एक महिला हव्वा से पैदा किए गए चाहे उनकी कौमियत कुछ भी हो कबीला कोई भी हो किसी भी रंग व वंश के हों और जेंडर कुछ भी हो पुरुष हों या महिला हों सब बराबर हैं सब से अफ़ज़ल वह है जो सबसे अधिक अल्लाह से डरने वाला है अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि " महिलाएं पुरुषों के बराबर हैं" (अबू दाऊद ) एक महिला इंसान होने के नाते पुरुषों के बराबर है उसे अपनी जिंदगी का फैसला करने का हक़ है उसे अपनी जायदाद व प्रापर्टी रखने का हक़ है उसे पैसे कमाने का मुकम्मल अधिकार है इंसान होने की हैसियत से पुरूष व महिला सब बराबर हैं हां घर व समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिम्मेदारियां व कार्य क्षेत्र बांट दिए गए हैं इसी कारण कुछ मामलों में पुरूषों के अधिकार व जिम्मेदारियां ज्यादा हैं तो कुछ में महिलाओं के अधिकार व जिम्मेदारी अधिक हैं इन जिम्मेदारियों व अधिकार से यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि औरतें मर्दों से कमतर हैं इसे ऐसे समझें कि मां और बेटे के रिश्ते में मां की अपनी एक हैसियत है और वह हमेशा के लिए है लेकिन जब बच्चा छोटा होता है तब मां की जिम्मेदारियां अधिक होती हैं पर जब बच्चा बड़ा होता है मां बूढ़ी हो जाती है तो बच्चे की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं लेकिन इन जिम्मेदारियों के बावजूद मां की अपनी हैसियत एक रहती है इन अधिकारों व जिम्मेदारियों से कुछ लोगों ने यह समझ लिया है कि इस्लाम में पुरूषों का मुकाम बड़ा है जो सही नहीं है सवाल यह है कि महिलाओं की गवाही पुरुषों की तुलना में आधी क्यों मानी जाती है जवाब है कि वह भी मुकम्मल सच नहीं है पैसों के लेनदेन और धन से जुड़े मुद्दों में महिलाओं की गवाही आधी है तो पर्सनल लॉ से जुड़े बहुत से मुद्दों में महिलाओं की गवाही पुरुषों की तुलना में दोगुनी है Khursheeid ahmad

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