Islam me aurat aur parda
एक बहस चली है कि, मुसलमान लड़कियां दूसरे मज़हब के लड़कों के साथ भाग कर, शादी कर रही है।
यहां बैठे लगभग लोग, जो मुसलमान होने का दम भरते हैं, वो उन्हें कोस कोस कर इस्लाम को बचा रहे हैं। लेकिन क्या कभी आप ने सोचा है, वो लड़कियां आख़िर क्यों दूसरे मज़हब के लड़कों के साथ सिर्फ़ शादी नहीं कर रही, बल्कि भाग कर शादी कर रही है?
वजह पर आइए न, महज़ कोसने से कुछ नहीं होने वाला है, ऐसा करने से, आपके मन की भड़ास ही निकलेगी। मैंने इस मुद्दे पर बहुत लिखा है, जिसका उनवान, इस्लाम मे महिलाओं की आज़ादी है, जिसे हम मुसलमानों ने लड़कियों से दूर कर रखा है। फ़िर उन्हें जहाँ भी आज़ादी दिखाई देगी, वो उस तरफ़ कैसे नहीं जाएंगी?
एक जमाना था, जब इस्लाम में औरतें मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चला करती थी, पर्दे वरदे की बात मत कीजिए। एक तरफ़ आप अपने घर की औरतों को बिना नक़ाब घर से बाहर तक निकलने नहीं देना चाहते हैं, दूसरी तरफ़ मस्जिद ए अक़्सा से महिलाओ की बिना बुर्के वाली तस्वीरें सरेआम शेयर करते हुए गर्व महसूस करते हैं। पर्दे का ताल्लुक़ नक़ाब से नहीं है, वो महज़ ज़रिया है पर्दे का। नक़ाब में इस्लाम नहीं है, बल्कि इस्लाम मे पर्दा है। दोनो दो बात है..
इक़रा क़ुरान का पहला लफ्ज़ था, लेकिन आज रेशियो उठा कर देखिए, कितनी प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं पढ़ती है, असल मे पढ़ती कहने के बजाय पढ़ाई जाती है कहना ज़्यादा सही होगा। जवाब क्या मिल रहा है आपको? कुछ जिन्हें ताना देते हुए लिबरल मुसलमान कहा जाता है, उनके घर आपको वैसी महिलाएं दिख जाएंगी, जो हायर स्टडी कर पाती हैं। जबकि इस्लाम ने कभी पढ़ने से किसी महिला को नहीं रोका है।
महिलाओं को, प्रॉपर्टी का अधिकार सबसे पहले इस्लाम ने दिया। लेकिन आप कितने मुसलमान को जानते हैं, जिन्होंने अपने बाप दादा की प्रॉपर्टी में अपनी बहन को हिस्सा दिया हो? या कितने बाप ने अपनी बेटियों को अपनी प्रोपर्टी में हिस्सा दिया है? ऐसे लोग, उंगलियों पर, वो भी ढूंढ कर गिने जाते हैं।
आप अपने घर की लड़कियों को बिला वजह की बंदिश में मत बांधिए, ठीक वैसे ही जैसे अपने घर के लड़कों को नहीं बांधते हैं, बल्कि तरबियत दीजिए कि वो इस्लाम के पैरोकार रहें और अपनी माँ बाप के फरमाबरदार बने रहे। या आपको अपनी तरबियत पर यकीन नहीं है? कि आपकी बेटी बहक जाएगी? फ़िर आपको अपने बेटे पर यक़ीन कैसे है कि वो इस्लाम से मिलने वाली आज़ादी से ज़्यादा आज़ाद होकर भी नहीं बहकेगा? या उसके लिए इस्लाम से ऊपर उठ जाना चलता है?
यहां आप साइकोलॉजी समझाइए, एक बाप की दो औलादें हैं, एक लड़का और दूसरी लड़की। लड़का सबसे मिल सकता है, सबसे बात कर सकता है, किसी को भी घर पर ला सकता है, चाहे वो पुरुष हो या महिला। लेकिन, उसी की बेटी ऐसा नहीं कर सकती है, वो किसी अपोजिट जेंडर से अपने भाई की तरह बात नहीं कर सकती है, उसे घर नहीं बुला सकती है। जबकि इस्लाम मे नामहरम में कांसेप्ट दोनो के लिए है। फिर ऐसे में वो वहां क्यों नहीं जाना चाहेगी, जहां दोनो के लिए दिखनेवाली आज़ादी बराबर नज़र आती है।
मैं ये नहीं कह रहा हूँ, लड़कियों को उनका इस्लामिक अधिकार दे देने से, ऐसे मामले पूरी तरह से बंद हो जाएंगे लेकिन ये ज़रूर कह रहा हूँ, ऐसे मामलों में कमी ज़रूर आएगी। बस आपको अपने घर की लड़कियों और महिलाओं पर भी उतना ही यक़ीन रखने की ज़रूरत है, जितना आप अपने घर के लड़कों और मर्दों पर करते हैं।
मेरी नज़र में कई वजहों में ये वजहें आम दिखाई देते हैं, जहाँ लड़कियां दूसरे मज़हब के लड़कों के साथ ज़्यादा सहज महसूस करती है, क्योंकि उसे लगता है, उस लड़के के घर मे उसकी बहन को जज नहीं किया जाता है, जैसे उसे उसके घर मे किया जाता रहा है। ऐसा भी नहीं है, सिर्फ़ यही वजह है, इसके अलावा दो वजहें और हैं, जिसपर आइंदा कभी बात करूंगा।
johar
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