Musalman aur andhbhakti
अंधभक्ति बहुत ही बुरी चीज़ है एक अंधभक्त खुद तो ग़लत होता ही है साथ में जिस की अंधभक्ति करता है उसे भी ग़लत साबित कर देता है अंधभक्त सिर्फ दूसरों में हों ऐसा नहीं है मुस्लमानों में भी इनकी कमी नहीं है
एक बुजुर्ग के बारे में उनके अंधभक्त कहते हैं कि वह एक रात में एक हजार रकात नफिल नमाज़ पढ़ते थे
दस बारह घण्टे की रात में एक हज़ार रकअत नमाज़ पढ़ना मुमकिन ही नहीं है और मान लीजिए कोई पढ़ भी लेता है तो यह तारीफ की बात कैसे हो गई?
सवाल यह है कि नमाज़ या दूसरी इबादतों में क्वांटिटी का महत्व है या क्वालिटी का ? फ़र्ज़ नमाज़ की तादाद फिक्स है लेकिन नफिल नमाज़ व्यक्ति के उपर है जितनी तौफीक मिले अब अगर कोई ज्यादा रकअत का लक्ष्य बना लें तो ज़रूर उसे क्वालिटी से कंप्रोमाइज करना पड़ेगा , किसी चीज़ की क्वालिटी से कंप्रोमाइज करना तारीफ की बात कैसे हुई यह तो एक ऐब है
अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम एक रात में 8 रकअत तहज्जुद और तीन रकअत वित्र नमाज़ पढ़ते थे यह आठ रकअत ऐसी होती थी कि खड़े खड़े आप के कदमों में सूजन आ जाती थी
सवाल यह है कि अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम की आठ रकअत बेहतर है या फलां बुजुर्ग की एक हजार रकात
इस लिए कोई भी बात अंधभक्ति में न कहें पहले उसे तौलें और तौलने के लिए सबसे बेहतर पैमाना हमारे नबी सललाहो अलैहे वसल्लम हैं अगर उस पैमाने पर वह बात पूरी नहीं उतर रही है तो वह सही नहीं है आप तारीफ नहीं बुराई करने में लगे हुए हैं
इसी तरह एक बुजुर्ग एक दिन व रात में तीन बार कुरान खत्म करते थे एक दूसरे बुजुर्ग चालीस साल तक ईशा के वज़ू से फजिर की नमाज अदा करते रहें इन सब बातों को आप तारीफ समझते हैं लेकिन यह बहुत घटिया किस्म का आरोप है
Khursheeid ahmad
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें