Roza aur Qur'an
क़ुरआन सूरा अल बक़रा में रोज़ा फ़र्ज़ होने की बात कही गई है इस सूरा की आयत नंबर 183-184- 185-187 में रोज़ा रमज़ान और उस के अहकाम पर बात हुई है लेकिन बीच में आयत नंबर 186 का टापिक दूसरा है इस आयत में है कि
"( हे नबी )जब आप से मेरे बंदे मेरे बारे में सवाल करें तो मैं करीब हूं मैं दुआ करने वाले की दुआ सुनता हूं जब वह मुझ से दुआ करता है , तो उसे चाहिए कि मेरा हुक्म माने और मुझ पर ईमान लाए ताकि वह हिदायत पाए "
रमज़ान और रोज़े के हुक्म के बीच यह आयत बेमक़सद नहीं है बल्कि इस से यह समझ में आता है कि रमज़ान में और रोज़े की हालत में दुआएं ज़्यादा कबूल होती हैं यह ऐसा मौका है जिस का हमें फायदा उठाना चाहिए
दुआएं दो तरह की होती है एक वह जो कुरान व हदीस से साबित है और उनके अल्फ़ाज़ में हैं दूसरी वह दुआएं जो हमारे अपने शब्दों में होती हैं जो दुआए मसनूना हैं उनका अपना महत्व है उन्हें याद करना चाहिए
लेकिन कभी कभी यह तकल्लुफ छोड़ कर अपने शब्दों में अपने अंदाज में टूटे फ़ूटे लहजे में भी दुआ ज़रूर करनी चाहिए अल्लाह हमारे हर भेद को जानता है उस के सामने तकल्लुफ कैसा अपने शब्दों में ही आदमी अपनी बात ज्यादा अच्छी तरह कर सकता है
रमज़ान में चलते फिरते उठते बैठते दुआएं करते रहना चाहिए कबूलियत का वक्त है
अल्लाह हमें तौफीक़ दे आमीन
ikram Ishrat
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