Sabr aur Ramazan
रमज़ान सब्र का महीना है
सब्र क्या है मजबूरी या मज़बूती
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सब्र का शाब्दिक अर्थ है रुक जाना सब्र कहते हैं खुशी गमी तकलीफ़ परेशानी व दर्द बर्दाश्त करने की ताकत को , सब्र कहते हैं किसी भी परेशानी में उस प्रतिक्रिया से बचने को जो अक़्ल व शरियत के खिलाफ हैं
सब्र कहते हैं किसी नेकी और अच्छे काम पर जम जाने को , सब्र नाम है अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए हर तकलीफ़ बर्दाश्त करने का
रमज़ान को सब्र का महीना इस लिए कहा जाता है कि इस में रोजेदार भूख प्यास और तकलीफों को सह कर ख़ुशी ख़ुशी अपने रब की इबादत में लगा रहता है
सब्र मजबूरी नहीं मज़बूती है इस की मिसाल यूं समझ लें कि दो बच्चों को आप डाक्टर के पास इंजेक्शन लगवाने ले जाएं एक बच्चा खामोशी से इंजेक्शन लगवा लेता है और दूसरा रो कर चिल्ला कर इंजेक्शन लगवाता है इंजेक्शन से दोनों बच्चों को एक जैसी तकलीफ़ हुई लेकिन एक रोया चिल्लाया दूसरे ने सब्र किया आप दोनों में किसे मजबूत कहेंगे रोने वाले बच्चे को या सब्र करने वाले बच्चे को ? जाहिर है सब्र करने वाला ही मजबूत है
रो पीट कर खामोश रह जाने का नाम सब्र नहीं है बल्कि तकलीफ के शुरुआत से ही उसे बर्दाश्त का नाम सब्र है जैसा कि अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि الصبر عند الصدمه الاولى सब्र पहले सदमे के समय होता है
सब्र करने वाला अगर शिकायत भी करता है तो सिर्फ अल्लाह के हजूर और इसी लिए इन्ना अल्लाह मआ अस्साबिरीन अल्लाह ताला सब्र करने वालों के साथ है
असल में सब्र का ताल्लुक शुक्र से है खुशी और तकलीफ दोनों अल्लाह की तरफ़ से है जो बंदा अल्लाह की अता की हुई तकलीफों को बर्दाश्त नहीं कर सकता वह उस की दी हुई खुशियों की भी कद्र नहीं कर सकता
हम व्यक्तिगत तौर पर सब्र भी करते हैं और शुक्र भी पर अफसोस एक भारतीय मुस्लिम क़ौम की हैसियत से सब्र को भी भूल चुके हैं और शुक्र को भी हम सिर्फ शिकायत करने वाले बन कर रह गए हैं
Ikram Ishrat
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