Sura tauba

सूरा तौबा ""'''""'"""""""" सूरा तौबा पर बात करने से पहले आइए उन हालात को जानते हैं जिन हालात में सूरा तौबा नाज़िल हुई दूसरी पोस्ट में सूरा तौबा पर बात होगी इंशाल्लाह रमज़ान सन 8 हिजरी में मक्का फतेह होता है और उसके छह महीने के अंदर हुनैन व तायफ़, लगातार इन तीनों जीत के बाद ऐसा लगता है कि अरब के दूसरे शहर व कबीला वाले इंतजार में थे सब मदीना आते अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम से मिलते और इस्लाम में दाखिल हो जाते , जिन कबीला वालों ने इस्लाम कबूल नहीं किया उन्होंने भी अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम से मिल कर समझौता कर लिया सन 9 हिजरी में मदीना में यह खबर पहुंचती हैं कि अरब के सरहदी इलाकों के कुछ कबीले जिन के संबंध रूम के बाइजेंटाइन साम्राज्य से अच्छे थे वह लोग मदीना पर आक्रमण के लिए तबूक नाम की जगह पर इकट्ठा हो रहे हैं उनके साथ रूम की फ़ौज भी और राजा हरक्यूलिस खुद भी उनके साथ शामिल होने वाले हैं मुसलमानो के पास कोई प्रशिक्षित सेना नहीं थी और अरब में जिन से लड़ाइयां हुई थी वह भी आम लड़ाका थे प्रशिक्षित नहीं थे अब बाकायदा एक अधिकारिक प्रशिक्षित सेना से मुकाबला करना था और वह भी उस देश की सेना से जो उस समय की दो सुपर पावर देशों में से एक देश माना जाता था अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम ने काफी सोच-विचार कर यह फैसला लिया कि तबूक चल कर उनका मुकाबला करना है यह फैसला आसान नहीं था फासला लंबा था करीब 700 किलोमीटर का सख्त गर्मी का मौसम था खजूरों के पकने और खेती बाड़ी का सीज़न था किसानों का अपने सीज़न में सात सौ किलोमीटर जाना और आना आसान नहीं था कई महीने लग जाते और फसल बर्बाद हो जाती लेकिन वह सहाबा थे जान निसारी उन का शौक था आज ए सी रूम में बैठ कर माइक के सामने कोई कुछ भी बोले लेकिन सहाबा जैसा जज्बा कोई पेश नहीं कर सकता , तीस हजार की बड़ी तादाद में लोग तबूक जाने के लिए तैयार हो गए अब मसला था इतनी बड़ी संख्या में सैनिकों के खाने सवारी और दूसरी जरूरतों का इंतजाम करना इस के लिए चंदा हुआ और हर सहाबी ने भरपूर चंदा दिया एक तरफ़ हज़रत उस्मान जैसे मालदार थे जो सवारी के लिए तीन सौ से अधिक ऊंट दे रहे थे तो दूसरी तरफ अब्दुल्लाह मुजनी जैसे सहाबी थे जिन्होंने रात देर तक खेतों में मजदूरी करके कुछ किलो खजूरें कमाई थीं और उन्हें ही ला कर पेश कर दिया था हज़रत अबू बकर सिद्दीक का जो हाल था उसे अल्लामा इक़बाल ने बयान किया है परवाने को चिराग है , बुलबुल को फूल बस सिद्दीक के लिए है खुदा का रसूल बस एक तरफ़ यह जोश व जज्बा था दूसरी ओर लोग यह समझ रहे थे कि मुसलमान मौत के मूंह में जा रहे हैं अब बच के आना नहीं है भला रूम वालों से टकरा कर कोई जिंदा रह पाया है , इस्लाम खत्म और किस्सा तमाम जैसे रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम मदीना से तबूक के लिए निकले मुनाफिकीन ने अपने लिए एक अलग मस्जिद बना ली जिस का नाम मस्जिद जिरार रखा यह मस्जिद इबादत के उद्देश्य से नहीं बनाई गई थी बल्कि यह उन का सेंटर था इरादा यही था कि तबूक में मुसलमानों को शिकस्त हो और यह मदीना पर कब्जा कर लें अरब के जिन गैर मुस्लिम कबीला वालों ने समझौता किया था उन में से अधिकांश ने समझौता तोड़ने का ऐलान कर दिया अरब के यहूदियों और ईसाइयों ने देखो और इंतजार करो की पालिसी अपनाईं खुद तो कुछ नहीं किया लेकिन सब को शह देते रहे अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम और इस्लामी सेना तबूक पहुंची लेकिन मुकाबला न हो सका यह लोग वहां 27 या 29 दिन वहां रह कर मदीना के लिए वापस हो गए यह वह हालात थे जिन में सूरा तौबा नाज़िल हुई वाट्स ऐप युनिवर्सिटी ने सूरा तौबा के बारे में भक्तों के दिमाग में इतना ज़हर भरा है कि उस पर थोड़ी लंबी बात करना जरूरी था भक्त सूरा तौबा का नाम नहीं जानते लेकिन कुरान की नौंवी सूरत के बारे में बात करते हैं सूरा तौबा ही नौवीं सूरत है क्रमशः Khursheeid ahmad

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Dangon me pista bhartiy musalman

Ekhlaas

History of islam