Dangon me pista bhartiy musalman
mohd zahid
दंगों में पिसता भारतीय मुसलमान:-
* मुरादाबाद ईदगाह , 13 अगस्त 1980 , ईद का दिन , ईदगाह में ईद की नमाज़ पढ़ने आए लोगों पर पीएसी ने ईदगाह का दोनों गेट बंद करके घेराबंदी की और सीधे फायरिंग की , 300 से अधिक नमाज़ी कत्ल कर दिए गए।
इस घटना को हुए 40 वर्ष से अधिक हो गए। लेकिन आज तक इसकी न्यायिक जांच नहीं हुई और नमाज पढ़ रहे लोगों पर गोली चलाने वाले पुलिस वालों पर मुकदमा तक दर्ज नहीं हुआ।
* हाशिमपुरा , 22 मई 1987 को 350 मुसलमानों की सामूहिक हत्या हुई है जिसमें पीएसी के 19 जवानों ने 42 मुसलमानों को उनके घर से निकाला और पीएसी की ट्रक यूआरयू-1493 पर लादा और थ्री नॉट थ्री राइफलों से गोली मार कर गंग नहर तथा हिंडन में फेंक दिया।
निचली अदालत ने सभी आरोपियों को बाईज्जत बरी कर दिया जिन्हें 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट ने सज़ा सुनाई मगर तब तक अधिकांश पुलिस वाले स्वर्ग सिधार गए।
* 23 मई 1987 , हाशिमपुरा से 9 किमी दूर मलियाना , इसी पीएसी की 44वीं बटालियन के एक कमांडेंट आरडी त्रिपाठी के नेतृत्व में पीएसी के जवान मलियाना गांव में घुसे और 72 मुसलमानों को सीधे गोली मार दिया गया।
दरअसल तत्कालीन गृहराज्य मंत्री पी चिदंबरम ने 18 मई 1987 को उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के साथ मेरठ के दंगा प्रभावित हाशिमपुरा इलाकों का दौरा किया था।
गाजियाबाद के तत्कालीन कप्तान वी एन राय के सत्य हिंदी डाट काम पर दिए बयान के अनुसार चिदम्बरम ने तब मेरठ के कप्तान से कहा था कि
"मैंने पंजाब में 10 हज़ार सिखों को मार कर पंजाब में शांति ला दी और तुम यहां 100 मुसलमानों को मार कर शांति नहीं ला सकते ?"
चार दिन बाद हाशिमपुरा और पांचवें दिन मेरठ में पुलिस ने 100 से अधिक निर्दोष मुसलमानों को मार डाला।
29 मई 1987 को राज्य सरकार ने गोली मारने का आदेश देने वाले आरडी त्रिपाठी को सस्पेंड करने की घोषणा की , मगर यह केवल घोषणा ही थी , आरडी त्रिपाठी कभी सस्पेंड नहीं हुआ और अपने सेवानिवृत्त तक प्रमोशन पर प्रमोशन पाता रहा।
इस हत्याकांड की एफआईआर-प्राथमिकी तो दर्ज की गई थी, लेकिन उसमें उन पीएसी के किसी सिपाही तक का कोई जिक्र नहीं था। कुछ दिनों बाद यह एफआईआर भी गायब हो गयी और अदालत में पेश नहीं हो सकी।
37 साल बाद मलियाना के सभी आरोपी, जिसमें वह पुलिस वाले नहीं थे , बाईज्जत बरी हो गए।
* 3 जून 1987 , मेरठ जेल में 7 और फतेहगढ़ जेल में 12 मुसलमानों को न्यायिक हिरासत में गोली मार कर हत्या कर दी गई।
इन दोनों की घटनाओं की जांच के भी आदेश दिए और फतेहगढ़ जेल में हुईं घटना की मटिस्ट्रेट जांच के आदेश से यह स्थापित हुआ कि ‘जेल के अंदर हुई हाथापाई’ में अन्य स्थानों के अलावा चोटों के परिणामस्वरूप इन सभी लोगों की मौत हो गई।
रिपोर्ट के अनुसार, आईजी (जेल) यूपी ने चार जेल वार्डन, दो जेल प्रहरियों (बिहारी लाई और कुंज बिहारी), दो दोषी वार्डन (गिरीश चंद्र और दया राम) को निलंबित कर दिया।
इस रिपोर्ट के आधार पर मेरठ कोतवाली थाने में इन सभी हत्याओं से जुड़े मामले दर्ज किए गए लेकिन एफआईआर में कुछ अधिकारियों के जांच में आरोपित होने के बावजूद पिछले 34 वर्षों में कोई अभियोजन शुरू नहीं किया गया।
* भागलपुर 24 अक्टूबर 1989 , भागलपुर जिले के लौगांय गांव में लहलहाती गोभी से भरा एक खेत खोदा गया। लेकिन खेत गोभी के लिए नहीं खोदा गया था। वहां छोटे-छोटे लाल रिबन निकले थे।
बच्चों के बालों में लगाए जाने वाले रिबन के साथ सर भी थे और शरीर भी कुछ और जगहों से भी लाशें निकल रही थी. कुल 110 लाशें थी. इनमें 52 छोटे-छोटे बच्चे थे लौगांय में 25 मुसलमान परिवार रहते थे जिसमें 400 लोग थे।
"बच्चा बच्चा राम का बाकी सब हराम का" नारा लगाती भीड़ ने सबको मार डाला।
पुलिस कप्तान थे आईपीएस अधिकारी कृष्ण स्वरूप द्विवेदी ( के एस द्विवेदी) जिन्होंने भागलपुर दंगाईयों को खुली छूट दी और इस दंगों में कुल 1000 लोग मारे गए जिसमें अधिकांश मुसलमान थे।
26 अक्टूबर, 1989 को भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भागलपुर का दौरा किया था और तत्कालीन मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा से कृष्ण स्वरूप द्विवेदी का तुरंत तबादला करने को कहा।
सिन्हा ने अपने संस्मरण "मेरी यादें, मेरी भूलां" में लिखा है कि
"द्विवेदी को तत्कालीन प्रधानमंत्री के कहने पर स्थानांतरित किया गया था। हालांकि, निवासियों के कड़े विरोध के बाद आदेश को रद्द कर दिया गया"
कमीशन ऑफ इनक्वायरी (CoI) ने कहा कि "अक्टूबर-नवंबर 1989 में जो भागलपुर दंगा हुआ, उसमें हुए नरसंहार के लिए हम भागलपुर के तत्कालीन सीनियर सुपरिटेंडेंट (SSP) के एस द्विवेदी को जिम्मेदार मानते हैं। 24 अक्टूबर (दंगा शुरू होने की तारीख) से पहले जो हुआ, 24 अक्टूबर और इसके बाद की तारीखों में जो हुआ, उन सबके लिए SSP द्विवेदी पूरी तरह जिम्मेदार हैं। जिस तरीके से उन्होंने मुसलमानों को गिरफ्तार किया और उनकी हिफाजत के लिए पर्याप्त कोशिश नहीं की, उससे साफ पता चलता है कि वो सांप्रदायिक तौर पर मुसलमानों के खिलाफ कितने पक्षपाती हैं"।
जांच समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि
"नरसंहार से पहले की एक कुख्यात घटना भी द्विवेदी के सांप्रदायिक पूर्वाग्रह को बयान करने वाली थी। मुहर्रम के मौके पर उन्होंने एक नफरत से भरा भड़काऊ भाषण दिया था जिसमें उन्होंने भागलपुर को एक और कर्बला में बदल देने की बात की थी। जिसका मतलब यहां के मुस्लिम निवासियों के कत्लेआम से था। उस समय जिला-प्रशासन को इस बयान के लिए द्विवेदी को माफी मांगने के लिए कहना पड़ा था।
कमीशन ऑफ इनक्वायरी (CoI) का यह हिस्सा पटना हाई कोर्ट ने रिट संख्या 5259 पर फैसला सुनाते हुए निकाल दिया और कृष्ण स्वरूप द्विवेदी को क्लीन चिट दे दी गई।
1995 में जांच रिपोर्ट आने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी ने इसे दबा दिया क्योंकि इस जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई होती तो तमाम यादव लोगों को जेल में डाल दिया जाता जो उस भागलपुर दंगों में शामिल थे।
नीतीश कुमार ने फरवरी, 2006 में सेवानिवृत्त न्यायाधीश एनएन सिंह की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन किया , आयोग ने कई अधिकारियों को इसके लिए जवाबदेह ठहराते हुए दंगा पीड़ितों की सहायता के लिए प्रस्ताव दिया।
2019 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसी कृष्ण स्वरूप द्विवेदी को बिहार का डीजीपी बना दिया।
* मुंबई दंगा 1992 , बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भड़के इस दंगों में करीब 900 लोग मारे गए जिनमें अधिकांश मुस्लिम थे।
दंगों के कारणों की जांच के लिए जस्टिस बी एन श्रीकृष्ण जांच आयोग का गठन किया गया।
1998 तक पांच वर्षों तक, उन्होंने पीड़ितों, गवाहों और कथित अपराधियों से पूछताछ की। दंगों की भयावहता सुन सुन कर जस्टिस श्रीकृष्ण स्वयं डिप्रेशन में चले गए और उन्होंने स्वीकार किया कि
"किसी ने बताया कि गर्भवती महिला को तलवार से मारकर उसके पेट के अंदर से बच्चे को निकाल कर आग में डाला गया और यह बहुत ही मानसिक वेदना वाली बात थी"
जस्टिस श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट में शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे और तमाम शिव सैनिकों को प्रमुखता से इस दंगे का दोषी ठहराया गया।
तत्कालीन शिवसेना सरकार ने जस्टिस श्रीकृष्ण आयोग की सिफारिशों को खारिज कर दिया और आज तक, आयोग की सिफारिशों को न तो स्वीकार किया गया है और न ही महाराष्ट्र सरकार ने उन पर कार्रवाई की है।
दंगों में प्रमुख भूमिका निभाने वाले कई अभियोगी पुलिसकर्मियों को सरकार द्वारा पदोन्नत किया गया था और आरोपी राजनेता आज भी उच्च राजनीतिक पद पर बने हुए हैं।
10 जुलाई 2008 को, मुंबई की एक अदालत ने दंगों के सिलसिले में प्रमुख आरोपी शिवसेना के पूर्व सांसद मधुकर सरपोतदार और पार्टी के दो अन्य कार्यकर्ताओं को एक साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई और उन्हें तुरंत जमानत दे दी।
20 फरवरी 2010 को वह सजा पूरी किए बिना ही इस दुनिया से चल बसे।
* गुजरात 2002 , अयोध्या से अहमदाबाद जा रही साबरमती एक्सप्रेस के S-6 डिब्बे में गोधरा रेलवे स्टेशन से कुछ दूरी पर आग लगी और अयोध्या से दर्शन करके आ रहे 62 लोग जल कर मारे गए।
इसके उपरांत पूरे गुजरात में सांप्रदायिक तनाव फैल गया , गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार के प्रशासन ने इस तनाव को कम करने की जगह शवों की उनके इलाकों में शवयात्रा निकालने की अनुमति दी और भारी सांप्रदायिक तनाव भयावह दंगों में बदल गया, दंगों 3 महीने तक चलते रहे और सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2500 लोग मारे गये।
गोधरा में ट्रेन जलाने के आरोपियों को फांसी की सज़ा सुनाई गई और गुजरात के दंगों के आरोपी एक एक करके छूटते गये या जो सजायाफ्ता हुए उन्हें पेरोल पर बाहर रहने दिया गया।
दंगों में नरेंद्र मोदी के खिलाफ गवाही देने वाले आईपीएस संजीव भट्ट को आजीवन करावास की सज़ा दिलाई गई और तमाम अधिकारी जेल में बंद हैं।
तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी इसी गुजरात दंगों के बाद हिंदू हृदय सम्राट बनकर भारत में उभरे, गुजरात दंगों में जांच आयोग उच्चतम न्यायालय तक से क्लीन चिट पाकर बरी हुए और देश के प्रधानमंत्री बने हुए हैं।
यह कुछ उदाहरण बताने के लिए काफ़ी हैं कि भारत की सारी व्यवस्थाएं मुस्लिम विरोधी हैं और इनमें मुसलमानों के प्रति हद दर्जे से अधिक घृणा भरी हुई है।
इस देश में हजारों दंगों के बावजूद कोई भी दंगा विरोधी कानून नहीं है जिसमें दंगाईयों को विशेष अभियोजन के तहत त्वरित कार्रवाई करके सजा दिलाई जाए , जबकि आतंकवाद के विरोध में तमाम कानून हैं, ध्यान दीजिए कि आतंकवाद से मारे गए लोगों की संख्या सांप्रदायिक दंगों में मारे गये लोगों के मुकाबले कुछ भी नहीं।
हालांकि यूपीए-2 ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का मसौदा "सांप्रदायिक और टारगेटेड हिंसा की रोकथाम (न्याय और मुआवजे तक पहुंच) विधेयक 2011" संसद से पारित कराने की कोशिश की गई जो प्रभावित समूह धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक को सुरक्षा (पुलिस प्रोटेक्शन) और कानूनी मदद के लिए था।
गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में इस विधेयक का विरोध किया गया और संसद में इसे कानून बनाने से रोका गया।
इस देश को आज भी सांप्रदायिक दंगा विरोधी कानून की आवश्यकता है जिसमें सबसे अधिक मुसलमान तबाह होता है , जहां भी मुसलमान आर्थिक सामाजिक और शैक्षणिक रूप से मजबूत है वहां दंगा कराकर उन्हें हमेशा के लिए तोड़ देने की नीति एक संगठन की रही है।
उपरोक्त के अतिरिक्त, मुजफ्फरनगर, वाराणसी, इलाहाबाद, दिल्ली, किशनगंज, लखनऊ, कानपुर जैसे हज़ारों हज़ार उदाहरण सामने है जिनका चरित्र कमोबेश मेरठ , मलियाना, हाशिमपुरा और मुरादाबाद जैसा ही था।
मगर किसी दंगों के आरोपी को एक भी मामले में फांसी की सज़ा हुई ? जवाब होगा नही।
दूरदर्शन पर उसी खंड काल में लालकृष्ण आडवाणी और डाक्टर राही मासूम रज़ा एक चर्चा कर रहे थे, लाल कृष्ण आडवाणी मुसलमानों के खिलाफ आग उगल रहे थे , तभी डाक्टर राही मासूम रज़ा ने उनसे पूछा था कि भारत में अब तक कितने दंगे हुए होंगे, लाल कृष्ण आडवाणी ने तपाक से कहा कि लगभग 40000 , डाक्टर राही मासूम रज़ा ने कहा चलो हम 20000 मान लेते हैं , इतने दंगों के बावजूद भारत से एक मुसलमान अपने वतन को छोड़कर पाकिस्तान नहीं गया और तुम एक दंगे में अपना वतन छोड़ कर भाग खड़े हुए और हमें देशभक्ती का उपदेश दे रहे हो।
मुसलमान तमाम ज़ख्मों के साथ फिर भी इसी मुल्क से मुहब्बत करता रहा है जिसमें ना उसे हक मिलता है ना इंसाफ।
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