Ekhlaas

अबू अकील बहुत परेशान थे उन के पास न कारोबार था और न खेती-बाड़ी एक खजूर के बाग़ मे सिंचाई का काम करते थे जिस से बड़ी मुश्किल से चर का खर्च निकल जाता था वह परेशान थे कि अतिरिक्त पैसे कहां से लाएं कुछ सोच कर उठे और बाग के मालिक के पास गए मालिक ने पूछा क्या बात है कहा जनाब मुझे कुछ पैसों की जरूरत थी क्या आप इजाजत देंगे कि मैं रात देर तक ओवर टाइम करूं और जो मजदूरी बने वह मुझे दे दें मालिक ने कहा ठीक है मुझे कोई प्राब्लम नही है इस तरह कई दिनों ओवर टाइम करने के बाद जो मजदूरी मिली वह सिर्फ आधा साआ यानी लगभग डेढ़ किलो खजूर थी खजूर को कपड़े की गठरी में ले लिया और चल दिए मस्जिद ए नबवी की तरफ़ यह गज़वा तबूक की तैयारी का समय था अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम ने मुसलमानों से तलब किया था कि वह सेना की तैयारी के लिए पैसे या खाध सामग्री इकट्ठा करें तमाम सहाबा किराम ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था किसी ने सवारी के लिए ऊंट व घोड़े दिए थे और किसी ने खाने पीने का सामान अबू अकील भी अपनी छोटी सी जमा पूंजी ले कर मस्जिद ए नबवी की तरफ़ जा रहे थे दिल की अजीब कैफियत थी एक तरफ पहली बार इस तरह के कामों में हिस्सा लेने की खुशी थी और दूसरी तरफ यह भी शर्मिंदगी थी कि बहुत मामूली चीज ले कर जा रहे हैं वह मस्जिद में पहुंचते हैं देखते हैं कि अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम बैठे हुए हैं कुछ बड़े सहाबा भी उनके साथ बैठे हैं कुछ खड़े हैं अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम के सामने खाने के सामान का ढेर लगा हुआ है अबू अकील भी जा कर खड़े हो जाते हैं हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि वह अपने साथ लाई हुई खजूर को पेश करें क्योंकि वह बहुत कम थी कुछ मुनाफिक भी वहां मौजूद थे उन में से एक ने धीरे से पूछा अबू अकील यह क्या है अबू अकील ने कहा कि आधा साआ खजूर हैं यहां देने के लिए लाया हूं उस मुनाफिक ने अपनी कुछ साथियों की तरफ इशारा किया और वह लोग मज़ाक उड़ाने लगे कहा कि जब तुम गरीब हो तुम्हारे पास कुछ नहीं है तो दिखावा करने की क्या जरूरत है यह सब चल रहा था अल्लाह के रसूल सलललाहो अलैहे वसल्लम की निगाह अबू अकील पर पड़ गई पूछा क्या मामला है अबू अकील ने कहा कि कुछ खजूरें ले कर आया हूं अल्लाह के रसूल खड़े होते हैं और अबू अकील से बड़ी मोहब्बत से मिलते हैं और खजूर ले कर ढेर के ऊपर इस तरह बिखेर देते हैं जैसे तबर्रुक की चीजें बिखेरी जाती है अबू अकील खुश हो जाते हैं उन्हें लगता है कि आज मेहनत वसूल हो गई वज़न में तो यह सिर्फ डेढ़ किलो खजूरें थीं लेकिन इस में जो खूलूस था वह बहुत भारी था दुनिया में कोई तराजू ऐसा नहीं था जो इस खूलूस को तौल सके यह खूलूस दरबारे रिसालत में कबूल किया गया बल्कि खुद अल्लाह ने इसे कबूल किया और सूरा तौबा की आयत नंबर 79 इन की शान में नाज़िल हुई जिस में इन की हंसी उड़ाने वाले मुनाफिकों को डांट भी पिलाईं गई इस तरह इतिहास में न जाने कितने गुमनाम अबू अकील हैं जिन की मेहनत जिन के खूलूस से इस्लाम हम तक पहुंचा है न जाने कितनों के खून पसीने लगे हैं हमें इस की कद्र करनी है رضي الله عنهم أجمعين Khursheeid Ahmad

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