Mai Chhota tha

मैं छोटा था, याद नहीं कितनी उम्र रही होगी। हमारी गली में एक बूढ़े ताऊ आते थे, बिल्कुल पतली दुबली काया.. सूती कपड़ो का ढीला ढाला लिबाज़.. बहुत ही विन्रम.. आवाज़ में बिल्कुल दम नहीं.. साईकिल होती थी उनके पास, साईकिल पर एक कपड़े की थैली टँगी होती थी जिसके अंदर शक्कर की गोलियां होती थी। हमारे यहाँ उन शक्कर की गोलियों को "मखाणा" बोलते हैं। वे गली में आते, रास्ते में जो भी बच्चा मिलता उसकी हथेली में "राम" बोलकर मखाणा रख देते.. बदले में बच्चे भी "राम" बोल दे तो ठीक, ना बोले तब भी ठीक... इस तरह से बच्चों का हुजूम होता था उनके इर्द गिर्द.. ये वो दौर था जब चार दाने शक्कर मिल जाने पर बच्चों की मौज हो जाया करती थी। एक दिन मैंने उन्हें सघन मुस्लिम बाहुल्य इलाके में देखा.. वे वहाँ भी राम नाम के मीठे दाने बच्चों को बांट रहे थे। ना डर, ना ख़ौफ़, ना फ़र्क़, ना बच्चों की कोई कमी और ना ही किसी को कोई ऐतराज.. उनका मिज़ाज़ बिल्कुल वैसा ही था जैसा हमारे हिन्दू बाहुल्य इलाके में रहता है। मेरी नज़र में वो ताऊ रामभक्त थे। उनके राम के साथ ना तो श्री लगता था, ना जय और ना ही जी.. उनके राम सिर्फ राम थे। मैंने उनके मुँह से राम के अलावा कोई अल्फ़ाज़ नहीं सुना था। एक बुढ़िया रहती थी, उनके पास एक कॉपी और पेन हुआ करता था। वो सारा दिन बैठी उस कॉपी में "राम राम" लिखती रहती थी, इसके अलावा कोई काम नहीं उनका। तब मुझे समझ नहीं आया था कि ये ऐसा क्यों करती है, अब समझ आ गया है। वो भक्ति थी उनकी.. उनके ख़ामोश स्मरण, और छोटे छोटे चींटी जैसे शब्दों में बसे हुए राम का कद बहुत बड़ा था। उनके उस एक शब्द के राम के आगे आज सम्पूर्ण देश की तमाम शोर मचाती, चीखती चिंघाड़ती झांकियां बहुत ही बौनी नज़र आती है। उनके मन में जो राम थे, वे किसी को हिकारत से नहीं देखते थे। देखने वाला उस बुढ़िया को हिकारत से देख सकता है, कि ये क्या सारा दिन लिखती रहती है। सोचिए.. एक कागज़ और कलम... लिखने वाली लेखिका को राम के सिवाय कुछ लिखना नहीं आता.. उनकी कविता, कहानी, उपन्यास और जीवनी सब एक शब्द में.. उन्सियत की बहुत बड़ी मिसाल है ये। उनकी ख़ामोशी भी सुनाई देती थी, इनका चीखना भी फ़िज़ूल है। एक महिला है अभी.. अक्सर टकराना हो जाता है उनसे.. उनके बारे में ये है कि उन्होंने शादी नहीं की, उम्र करीब 55-60 साल होगी... जब भी मेरा उनसे सामना होता है वे मुझे देखकर कहती है "राम राम" ... सिर्फ मुझसे ही नहीं हर किसी से उनका सिर्फ "राम राम" कह देने भर का ताल्लुक है। वे जानती हैं कि मैं मुसलमान हूँ, उन्होंने कभी एक सेकंड की देरी नहीं की मुझे राम राम कहने में.. उनको मुझसे कोई लालच नहीं है, कुछ हासिल करने जैसी कोई चाह नहीं है.. मुसलमान हूँ जानती हैं.. ऐसा नहीं कि उन्हें मेरे मुँह से राम उगलवाना है.. बिल्कुल नहीं.. सबके साथ उनका एक सा सुलूक है। वो महिला मेरी नज़र में राम भक्त है। ऐसे लोग अपने भीतर बसे राम को बहुत ही आहिस्ते से सामने वाले के दिल में उतार देते हैं। उनके राम में ना तो श्री होता है ना जय.. ना चीखना, ना चिल्लाना.. ना किसी को हिकारत से देखना और ना ही किसी के लिए मन में कोई भेदभाव.. नज़रों की कैफ़ियत सबके लिए एक जैसी..सबको प्रेम भरा राम राम.. किसी के लिए कोई घृणा नहीं। दूसरी तरफ मेरे अपने समाज के लोगों ने सलाम पर पाबंदी लगा रखी है.. तुम वहाबी को सलाम मत करो, अहले हदीस को सलाम का जवाब मत दो.. जबकि मेरा व्यक्तिगत मानना है, कि सलाम एक दुआ है, एक मुहब्बत का पैग़ाम है जो हम सामने वाले को देते हैं। सलामती की इस दुआ के पीछे नियत कुछ भी हो सकती है। ईमान की सलामती की दुआ, जिस्म की तंदरुस्ती की दुआ, ज़ेहन के पाकीज़ा रहने की दुआ.. ये दुआ किसी को देने या लेने में हर्ज़ क्या है। क्या पता तुम किसी को दुआ दो, वो तुम्हारे हक़ में भी कुबूल हो जाए। ख़ैर... आजकल के इन स्वघोषित रामभक्तों को देखकर मैं अपने आपको धन्य समझता हूं कि मैंने अपनी ज़िंदगी में 3 असली रामभक्त देखे हैं। इस वक़्त हमारे इर्द गिर्द चीखते चिंघाड़ते विकराल डरावने लोग सत्ता लोभियों के पुर्जे मात्र हैं, इनका किसी भी आराध्य से कोई ताल्लुक नहीं है। इनका ताल्लुक हिंसा से है, इनका गहरा नाता भारत की भ्रष्ट राजनीतिक पार्टियों से है। मैंने असली रामभक्त देखे हैं, इसलिए दावे के साथ कह सकता हूँ कि मस्जिदों दरगाहों के सामने झंडा उठाकर अभद्रता के साथ नाचने वाले ये लफंगे किसी प्रकार की भक्ति भाव के आसपास भी नहीं है। ये सिर्फ नफरत करने, नफरत फैलाने और नफ़रत के भाव में जीने के लिए जन्मे हैं। ये लोग जीते जागते कलयुग का प्रमाण है। मैंने जिन 3 लोगों का ज़िक्र किया उसे पढ़कर आपको भी अपने पुरखे याद आये होंगे, कोई गुजरा जमाना आपके ज़ेहन के आगे से गुजरा होगा। डीजे से निकले हिंसक नारों पर नाचने वाले ये दानव उस भक्ति भाव के हत्यारे हैं जो गुजरे जमाने के लोगों के भीतर था। इन्होंने भक्ति को भय में रिप्लेस कर दिया है। कोई भक्त है तो ये उसे डराएंगे कि फलां धर्म के लोग तेरे दुश्मन है.. वो डरा हुआ भक्त अपनी विनम्रता, शालीनता और सद्भावना को फेंककर दूसरों को डराने का प्रयास करेगा.. यही थ्योरी है। अपने भीतर के डर को काबू करने के लिए लोग दूसरों को डराने का प्रयास करते हैं..। ये वो गंदी पाइप लाइने हैं जिनमे नफ़रत और डर की सप्लाई होती है। ये लोग हमारे/आपके मन की दीवारों पर छपी राम की सुदंर शालीन विनम्र तस्वीर पर कालिख़ पोतने का काम कर रहे हैं। मैं ये बर्दाश्त नहीं कर सकता.. जिन लोगों को बर्दाश्त होता है वे मक्कार हैं। ख़ासकर बहुसंख्यक समुदाय के वे लोग जो चुप हैं.. दरअसल वे शातिर हैं.. नीच हैं.. उनकी दो कौड़ी की हयात नफे नुकसान के तराजू पर टिकी हुई है। या फिर उनके भी मन नफरत का गंदा नाला बह रहा है। इसके अलावा और कोई बात नहीं। वरना कट्टरपंथियों द्वारा राम के नाम को जिस तरह सड़को पर लाकर रुसवा किया जा रहा है, उससे तो इनको बोलने पर मजबूर हो जाना चाहिए था। मैं अपने ख़ुदा की इज़्ज़त किसी के दिल में ना डाल सकूं तो मैं बन्दा ही नहीं... ऐसे में मेरे रोजे, मेरी नमाज़, मेरा माल कोई मायने नहीं रखता। मायने तब रखता है जब मैं अपने मन की ख़ुशबू से किसी के मन को मुअत्तर कर सकूं। मैं नफरत भड़काता फिरूँ, बदतमीजी को अपना मिज़ाज़ बना लूं, गाली गलौच करूँ, अश्लीलता पर उतरने के लिए आतुर रहूं, जहाँ जहाँ बस चला वहाँ लोगों का चैन हराम कर दूं तो मेरे ख़ुदा के नज़दीक मुझसे बड़ा बदबख़्त दूसरा कौन हो सकता है। बहरहाल मैं अपने ज़ाती तजुर्बे के साथ कह सकता हूँ जो राम का भक्त है वो किसी से रत्तीभर घृणा नहीं कर सकता... उसमें घृणा हो ही नहीं सकती। जो घृणा करता है, वो किसी भ्रष्ट नेता या फ़र्ज़ी संत का भक्त तो हो सकता है, राम का नहीं। ~ Abbas Pathan

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Dangon me pista bhartiy musalman

Ekhlaas

History of islam