Allama iqbal
ग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरें
जो हो ज़ौके यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें
यक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फातेहे आलम
जिहादे ज़िंदगानी में हैं यह मर्दों की शमशीरें
यह दोनों शेर अल्लामा इक़बाल की मशहूर नज़्म तुलूऐ इस्लाम से ली गई हैं
--ग़ुलामी में तलवार यानी ताक़त और तदबीर यानी अकल काम नहीं आती हां अगर इंसान अपने अंदर यकीन व विश्वास का टेस्ट पैदा कर ले तो उस से हर जंजीर कट जाती है
--पक्का यकीन लगातार काम करना और दुनिया के लोगों से मोहब्बत करना यह जिंदगी की लड़ाई में पुरुषों के हथियार हैं
दोनों शेर में अल्लामा इक़बाल ने ज़िंदगी का फलसफा बयान किया है और जिंदगी गुजारने व गुलामी से आजादी के लिए पक्के विश्वास पर जोर दिया है
अल्लाह पर विश्वास , दीन पर यकीन , कौम पर भरोसा और खुद पर एतिमाद यह सबसे ज़्यादा ज़रूरी है तरक्की के लिए
तरक्की चाहे अपनी हो समाज की हो या क़ौम की बगैर विश्वास के नहीं हो सकती एक मुर्दा दिल कभी तरक्की नहीं कर सकता एहसास ए कमतरी का शिकार और हीन-भावना से ग्रस्त व्यक्ति कभी कामयाब नहीं हो सकता अगर आप के अंदर खुद पर विश्वास नहीं है तो हर ताकत हर अकल बेकार है
आज हम भारतीय मुस्लमानों की परेशानी यही है कि हमें खुद पर विश्वास नहीं है कोई भी कहता है कि तुम जाहिल हो हम मान लेते हैं कोई भी कहता है तुम पंचर छाप हो हम यक़ीन कर लेते हैं कोई भी कहता है कि तुम्हारे यहां फिरका परस्ती ज्यादा है हम तस्लीम कर लेते हैं
हमें खुद पर यकीन क्यों नहीं है हम एहसास ए कमतरी के शिकार क्यों हैं
जब तक यह अविश्वास , अदमे एतिमाद खत्म नहीं होगा हम कामयाब नही हो सकते
Khursheeid ahmad
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